Life Learnings-5 by Prof. KK Garg
Steps of Love and Courage
प्रेम और साहस की सीढ़ियां
जीवन में प्रेम , साहस और विचार के फूल न खिलें तो जीवन घृणा ,भय और अंध विश्वाससे भर जाता है
कैसे अंकुरित हों ये बीज ? कैसे भूमि तैयार हो ?
सबसे पहले तो यह समझें की हम प्रेम के बीजों को कैसे रोकते हैं।
हम सब प्रेम चाहते हैं दूसरों से , लेकिन प्रेम देने से डरते हैं।अगर हम प्रेम देते भी हैं तो सिर्फ इक्के दुक्के लोगों को। शायद हम सब ने हमेशा यही सुना है की यहाँ प्रेम से कोई सुनता ही नहीं।इसलिए हमें हमेशा रोब और गुस्से से काम लेना चाहिए। इसलिए हम प्रेम के बीजों के अंकुरित होने से डरते हैं।हमें यह लगता है की अगर हम प्रेम पूर्ण हो गए तो इसका फायदा हमें नहीं दूसरों को मिलेगा। दूसरे हमारा कहना नहीं मानेगे। दूसरे हमें कमजोर समझेंगे और हमारा फायदा उठाएंगे। हम यह भूल ही जाते हैं की फूल की सुगंध दूसरे को तो तभी मिलती है जब कोई फूल के पास आता है। लेकिन फूल तो चौबीस घंटे सुगन्धित रहता है। प्रेम की सबसे पहले सुगंध हमको ही मिलेगी।
कहाँ गलती है हमारी सोच में ?
जहाँ हमें पता है प्रेम से काम होगा हम प्रेम की एक्टिंग भी कर लेते हैं और जहाँ लगता है रॉब से काम होगा वहां हम गुस्सा करते हैं । इसलिए गुस्से का पौधा लगातार बढ़ता रहता है और प्रेम के बीज पौधा नहीं बनते। क्योंकि गुस्सा हम सचमुच में करते हैं और प्रेम की सिर्फ एक्टिंग करते हैं।
क्या कर सकते है हम ?
अगर कहीं गुस्सा करना बहुत जरूरी है तो वहां हम गुस्से की एक्टिंग कर सकते है , इससे गुस्से का पौधा नहीं पनपेगा। और प्रेम की एक्टिंग की बजाये हम प्रेमपूर्ण हो सकते हैं।
इससे प्रेम का पौधा बढ़ेगा और क्रोध अपनी जड़ नहीं जमा सकेगा। लेकिन एक बात ध्यान रखनी पड़ेगी की गुस्सा हमें होश पूर्वक करना पड़ेगा। यानि यह जानते हुए की मैं गुस्से की एक्टिंग कर रहा हूँ। अगर यह समझ आता हो तो प्रेम के पौधे की जमीन तैयार होगी। और हम प्रेम की सीढियाँ चढ़नी शुरू कर सकते हैं।
पहली सीढ़ी है दया की हम दयावान कैसे हों
दया -
दया वोह प्रेम है जो हमारे अंदर तभी उठता है जब कोई दूसरा बहुत दुःख, पीड़ा या लाचारी में हो। अगर कोई दुखी ,पीड़ा या लाचारी में नहीं है तो हमें यह दया महसूस नहीं होती। यह प्रेम हमेशा दुसरे पर निर्भर है। अगर हम में दया उठती है तो इसका मतलब है की हम प्रेम के बीजों को अंकुरित होने दे रहे हैं.
हम कैसे रोकते हैं दया को और मन कैसे खेलता है खेल
जब कभी हम किसी गरीब लाचार को भीख मांगते देखते हैं तो हमारा मन बहुत लॉजिक देना शुरू करता है। मन कहेगा -
बहुत भिखारी हो गएँ हैं , सरकार को यह बंद कराना चाहिए। इनको काम करके खाना चाहिए। यह गरीब है अपने पिछले जन्मों के कारण। यह सब भगवान का खेल है वो किसी को अमीर बनता है किसी को गरीब। पीछे एक खबर आई थी की एक भिखारी जब मरा तो हज़ारों रूपये निकले उसके घर से।
जब हम किसी मज़दूर को कोरोना यात्रा में अपने बच्चे को कंधे पर उठाये या जब वो थक गया तो सूटकेस पे बच्चे को घसीटता है तो कभी कभी मन कहता है देखो इसके पास पहिये वाल सूट केस है कितने पैसा कमाता होगा यह। जब हम किसी बजुर्ग किसान पे ठण्ड में आंसू गैस या पानी की बौछारें देखते हैं तो मन कहता है यह सब राजनीति कर रहे हैं , इन्हें पैसे मिलते हैं , इन्हें मुफ्त की शराब मिलती है।
यह सब मन के खेल हैं जो मन खेलता है और रोकता है हमें दया करने से। ताकि कहीं हम अपने जीने की पूजी अपनी जेब से निकाल न दें।
मन क्यों करता है ऐसा और हम क्या कर सकते हैं
मन का एक काम यह भी है की यह हमारे जीवन में पहरेदार का काम भी करे। इसलिए मन हमारे जीवन के द्वार पर एक तलवार ले के खड़ा रहता है बचाने के लिए , हमारी सारी पूँजी ,चाहे वो हमारे विचार हों ,हमारे भाव हों, हमारा धन हो। मन उसे बचाने की पूरी कोशिश करता है।
मन अपना काम बहुत ईमानदारी से करता है। यह हमें हमारे दिल तक जाने से रोकता है। मन हमें रोकता है दिल तक पंहुचने से, क्योंकि मन को लगता है ,कि अगर दिल में प्रेम के अंकुर फूटेंगे तो हम कहीं अपनी धन दौलत लुटा न दे। लेकिन मन अनजान है प्रेम से भरे दिल के आन्नद से । और हम मन के हाथों गुलाम हो जाते हैं, और मन को करने देता हैं मनमानी ।
अगर हमें प्रेम के फूलों की सुगंध चाहिए और हम चाहते हैं की जीवन में फूल खिले तो हमें मन की चाल को समझना होगा। हमें समझना होगा की मन की अपनी मज़बूरी है। क्योंकि मन भीतर के आनंद को नहीं जानता । मन सिर्फ बाहर की सुख सुविधा खोजता है।
क्या करें हम
तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा की हम मन के ऊपर हैं और हम मन को मनमानी करने से रोक सकते हैं। हम मन के गुलाम नहीं हैं। जब कभी ऐसा मौका आता है किसी दुखी मजबूर या लाचार को देखने का तो हम हर बार मन के बहकावे में मत आएं। मन में जो सहानुभूति उठती है उसे उठने दें और कम से कम उस दुखी के लिए भगवान से प्रार्थना करें। अगर हम ऐसा कर पातें हैं तो हमारे भीतर प्रेम के बीज अंकुरित होने लगेंगे और हम पहली सीढ़ी पार कर पाएंगेऔर दूसरी सीढ़ी के काबिल होंगे।
क्या है प्रेम की दूसरी सीढ़ी ?....
Sharing my life learnings from "My corona Sanyas Meditations on Osho, Geeta and I Ching Book Of Changes" in USA.
With Hope Love and regards
Prof. K K garg
Flowers are fixed and cannot move so God gave them fragrances through stamens and filaments .They too have beautiful sepals and green petals to protect buds.Nature wants creation of species. Some flower less or impetfrct flowers also reproduce.Thete are flowers or plants like Fly trap ,taking insects as good Cornivorus ,killing then for their food like Coronavirus same letters I wrote an article on that.Flowers are selfless.They wish love only.
ReplyDeleteWe ,human being has a bigger desire of being loved.All want to love.Your version is not convincing.
Birds ,flowers,need no boundaries .No passports.Cocunuts came to India from remotestes farthest corners of the world.Somilarily ,flowers seeds grow.Future of coming generations is in the seed.Fifty species of mangoes.We are the identity of our grandparents,parents and in us is hidden the future of our generations..
ReplyDeleteExcellent advice . Frankly speaking I had similar thoughts comes to my mind when I see some beggars at red lights. Garg sahab I assure you I will change my thought process and from now onwards won’t bend what mana thinks. Thanks once again for opening my eyes. 🙏🙏
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